Pratibimb / प्रतिबिम्ब

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Archive for the ‘हिन्दी’ Category

कदम्ब का पेड़ (Kadamb ka Ped)

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यह कदम्ब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे
मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे

ले देतीं यदि मुझे बांसुरी तुम दो पैसे वाली
किसी तरह नीची हो जाती यह कदम्ब की डाली

तुम्हें नहीं कुछ कहता पर मैं चुपके-चुपके आता
उस नीची डाली से अम्मा ऊँचे पर चढ़ जाता

वहीं बैठ फिर बड़े मजे से मैं बांसुरी बजाता
अम्मा-अम्मा कह वंशी के स्वर में तुम्हे बुलाता

सुन मेरी बंसी को माँ तुम इतनी खुश हो जातीं
मुझे देखने को तुम बाहर काम छोड़ कर आतीं

तुमको आता देख बांसुरी रख मैं चुप हो जाता
पत्तों में छिप कर फिर धीरे से बांसुरी बजाता

बहुत बुलाने पर भी माँ जब नहीं उतर कर आता
माँ, तब माँ का हृदय तुम्हारा बहुत विकल हो जाता

तुम आँचल फैला कर अम्मां वहीं पेड़ के नीचे
ईश्वर से कुछ विनती करतीं बैठी आँखें मीचे

तुम्हें ध्यान में लगी देख मैं धीरे-धीरे आता
और तुम्हारे फैले आँचल के नीचे छिप जाता

तुम घबरा कर आँख खोलतीं, पर माँ खुश हो जाती
जब अपने मुन्ना राजा को गोदी में ही पातीं

इसी तरह कुछ खेला करते हम-तुम धीरे-धीरे
यह कदम्ब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे

– सुभद्राकुमारी चौहान

Written by timir

August 10, 2012 at 8:32 pm

कुछ साये, कुछ परछाइयाँ

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कुछ साये, कुछ परछाइयाँ, कुछ चाहत के सजदे,
कुछ बहते बादलों पे रक्खी उम्मीदें
बरसती रहीं, तरसती रहीं ।
चाँद आसमान में जड़े सुराख की तरह झांकता रहा
और रात…किसी अंधे कूएं की तरह मुंह खोले हांफती रही ।
रास्ते पाँव तले से निकलते रहे, ….न रुके, न थमे,
न रोका, न पूछा….ज़िन्दगी किस तलाश में है ।

ज़िन्दगी थकने लगी है, और ये… ज़िन्दगी का जुड़वां
उसकी ऊँगली पकड़े.. शहर की नंगी सड़कों पर
अभी तक कुछ बीन रहा है, कुछ ढूंढ रहा है ।

– गुलज़ार

(As a prelude to the song “Ek Akela Is Sheher Mein” from the movie Gharonda)

Written by timir

June 2, 2012 at 7:09 pm

नांव (Naav) – Udaan (2010)

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चढ़ती लहरें लांघ न पाए
क्यों हांफती-सी नांव है तेरी, नांव है तेरी
तिनका-तिनका जोड़ के सांसें
क्यों नापती सी नांव है तेरी, नांव है तेरी
उलटी बहती धार है बैरी, धार है बैरी
कि अब कुछ कर जा रे पंथी ….

जिगर जुटा के पाल बाँध ले
जो बात ठहरी जान पे तेरी, शान पे तेरी
हैय्या-हो कि तान साध ले
जो बात ठहरी जान पे तेरी, शान पे तेरी
चल जीत-जीत लहरा जा, परचम तू लाल फेहरा जा..
अब कर जा तू या मर जा, कर ले तैय्यारी…
उड़ जा बनके धूप का पंछी
छुड़ा के गहरी छाँव अँधेरी, छाँव अँधेरी
तिनका-तिनका जोड़ के सांसें
क्यों नापती सी नाव है तेरी, नांव है तेरी

रख देगा झकझोर के तुझे
तूफानों का घोर है डेरा, घोर है डेरा
भंवर से डर जो हार मान ले
काहे का फिर जोर है तेरा, जोर है तेरा
है दिल में रौशनी तेरे, तू चीर डाल सब घेरे
लहरों कि गर्दन कस के डाल फंदे रे …
कि दरिया बोले वाह ! रे पंथी
सर आँखों पे नांव है तेरी, नांव है तेरी …

चढ़ती लहरें लांघ न पाए
क्यों हांफती-सी नांव है तेरी,नांव है तेरी
उलटी बहती धार है बैरी, धार है बैरी
कि अब कुछ कर जा रे पंथी ….

Lyrics – Amitabh Bhattacharya

Written by timir

August 9, 2010 at 10:26 am

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जो मिल गया उसी को मुक़द्दर समझ लिया
जो खो गया मैं उसको भुलाता चला गया
ग़म और ख़ुशी में फ़र्क न महसूस हो जहाँ
मैं दिल को उस मुक़ाम पे लाता चला गया
मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया
हर फिक्र को धुंए में उड़ाता चला गया

– From Movie Name: Hum Dono (1961)

Singer: Mohd Rafi

Music Director: Jaidev

Lyrics: Sahir Ludhianvi

Written by timir

November 30, 2009 at 7:43 pm

सरफ़रोशी की तमन्ना – गुलाल (Sarfaroshi Ki Tamanna from Gulaal)

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सरफ़रोशी की  तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ु-ए-क़ातिल में है
वक़्त आने दे बता देंगे तुझे ऎ आसमाँ
हम अभी से क्या बताएँ क्या हमारे दिल में है |

ओ रे बिस्मिल काश आते आज तुम हिन्दोस्ताँ
देखते कि मुल्क़ सारा क्या टशन में, चिल में है
आज का लौंडा ये कहता हम तो बिस्मिल थक गए
अपनी आज़ादी तो भइया लौंडिया के दिल में है |

आज के जलसों में बिस्मिल एक गूँगा गा रहा
और बहरों का वो रेला नाचता महफ़िल में है
हाथ की खादी बनाने का ज़माना लद गया
आज तो चड्ढी भी सिलती इंग्लिसों की मिल में है |

Written by timir

April 10, 2009 at 7:16 pm

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आराम करो (Aaraam Karo)

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बचपन में मैने मैथिलीशरण गुप्त की कविता पढ़ी थी – “नर हो, न निराश करो मन को, कुछ काम करो कुछ काम करो …” | अच्छा है कि इसके विपरीत विचारधारा के लोग भी हैं दुनिया में | उनमें से एक हैं गोपालप्रसाद व्यास | उन्होने मैथिलिशरण गुप्त के टक्कर की एक कविता की रचना कर डाली ! कुछ इस प्रकार है –

एक मित्र मिले, बोले, “लाला, तुम किस चक्की का खाते हो?
इस डेढ़ छटांक के राशन में भी तोंद बढ़ाए जाते हो।
क्या रक्खा माँस बढ़ाने में, मनहूस, अक्ल से काम करो।
संक्रान्ति-काल की बेला है, मर मिटो, जगत में नाम करो।”
हम बोले, “रहने दो लेक्चर, पुरुषों को मत बदनाम करो।
इस दौड़-धूप में क्या रक्खा, आराम करो, आराम करो।

आराम ज़िन्दगी की कुंजी, इससे न तपेदिक होती है।
आराम सुधा की एक बूंद, तन का दुबलापन खोती है।
आराम शब्द में ‘राम’ छिपा जो भव-बंधन को खोता है।
आराम शब्द का ज्ञाता तो विरला ही योगी होता है।
इसलिए तुम्हें समझाता हूँ, मेरे अनुभव से काम करो।
ये जीवन, यौवन क्षणभंगुर, आराम करो, आराम करो।

यदि करना ही कुछ पड़ जाए तो अधिक न तुम उत्पात करो।
अपने घर में बैठे-बैठे बस लंबी-लंबी बात करो।
करने-धरने में क्या रक्खा जो रक्खा बात बनाने में।
जो ओठ हिलाने में रस है, वह कभी न हाथ हिलाने में।
तुम मुझसे पूछो बतलाऊँ, है मज़ा मूर्ख कहलाने में।
जीवन-जागृति में क्या रक्खा जो रक्खा है सो जाने में।

मैं यही सोचकर पास अक्ल के, कम ही जाया करता हूँ।
जो बुद्धिमान जन होते हैं, उनसे कतराया करता हूँ।
दीए जलने के पहले ही घर में आ जाया करता हूँ।
जो मिलता है, खा लेता हूँ, चुपके सो जाया करता हूँ।
मेरी गीता में लिखा हुआ, सच्चे योगी जो होते हैं,
वे कम-से-कम बारह घंटे तो बेफ़िक्री से सोते हैं।

अदवायन खिंची खाट में जो पड़ते ही आनंद आता है।
वह सात स्वर्ग, अपवर्ग, मोक्ष से भी ऊँचा उठ जाता है।
जब ‘सुख की नींद’ कढ़ा तकिया, इस सर के नीचे आता है,
तो सच कहता हूँ इस सर में, इंजन जैसा लग जाता है।
मैं मेल ट्रेन हो जाता हूँ, बुद्धि भी फक-फक करती है।
भावों का रश हो जाता है, कविता सब उमड़ी पड़ती है।

मैं औरों की तो नहीं, बात पहले अपनी ही लेता हूँ।
मैं पड़ा खाट पर बूटों को ऊँटों की उपमा देता हूँ।
मैं खटरागी हूँ मुझको तो खटिया में गीत फूटते हैं।
छत की कड़ियाँ गिनते-गिनते छंदों के बंध टूटते हैं।
मैं इसीलिए तो कहता हूँ मेरे अनुभव से काम करो।
यह खाट बिछा लो आँगन में, लेटो, बैठो, आराम करो।

– गोपालप्रसाद व्यास

Written by timir

January 20, 2009 at 2:49 am

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Mirza Ghalib’s Ghazals (part-VI) : कोई उम्मीद बर नहीं आती (Koi Ummeed Bar Nahin Aati)

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कोई उम्मीद बर नहीं आती
कोई सूरत नज़र नहीं आती

मौत का एक दिन मु’अय्यन है
नींद क्यों रात भर नहीं आती ?

मु’अय्यन = definite

आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी
अब किसी बात पर नहीं आती

जानता हूँ सवाब-ए-ता’अत-ओ-ज़हद
पर तबीयत इधर नहीं आती

सवाब = reward of good deeds in next life, ता’अत = devotion, ज़हद = religious deeds or duties

है कुछ ’ऐसी ही बात जो चुप हूँ
वर्ना क्या बात कर नहीं आती ?

क्यों न चीखूँ कि याद करते हैं
मेरी आवाज़ गर नहीं आती

दाग़-ए-दिल गर नज़र नहीं आता
बू भी ’ए चारागर ! नहीं आती

चारागर = healer/doctor

हम वहाँ हैं जहाँ से हमको भी
कुछ हमारी ख़बर नहीं आती

मरते हैं आरज़ू में मरने की
मौत आती है पर नहीं आती

काब’आ किस मुँह से जाओगे “ग़ालिब
शर्म तुमको मगर नहीं आती

Written by timir

November 20, 2008 at 7:14 pm

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