Pratibimb / प्रतिबिम्ब

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कुछ साये, कुछ परछाइयाँ

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कुछ साये, कुछ परछाइयाँ, कुछ चाहत के सजदे,
कुछ बहते बादलों पे रक्खी उम्मीदें
बरसती रहीं, तरसती रहीं ।
चाँद आसमान में जड़े सुराख की तरह झांकता रहा
और रात…किसी अंधे कूएं की तरह मुंह खोले हांफती रही ।
रास्ते पाँव तले से निकलते रहे, ….न रुके, न थमे,
न रोका, न पूछा….ज़िन्दगी किस तलाश में है ।

ज़िन्दगी थकने लगी है, और ये… ज़िन्दगी का जुड़वां
उसकी ऊँगली पकड़े.. शहर की नंगी सड़कों पर
अभी तक कुछ बीन रहा है, कुछ ढूंढ रहा है ।

– गुलज़ार

(As a prelude to the song “Ek Akela Is Sheher Mein” from the movie Gharonda)

Written by timir

June 2, 2012 at 7:09 pm

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