Pratibimb / प्रतिबिम्ब

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Mirza Ghalib’s Ghazals (part-VI) : कोई उम्मीद बर नहीं आती (Koi Ummeed Bar Nahin Aati)

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कोई उम्मीद बर नहीं आती
कोई सूरत नज़र नहीं आती

मौत का एक दिन मु’अय्यन है
नींद क्यों रात भर नहीं आती ?

मु’अय्यन = definite

आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी
अब किसी बात पर नहीं आती

जानता हूँ सवाब-ए-ता’अत-ओ-ज़हद
पर तबीयत इधर नहीं आती

सवाब = reward of good deeds in next life, ता’अत = devotion, ज़हद = religious deeds or duties

है कुछ ’ऐसी ही बात जो चुप हूँ
वर्ना क्या बात कर नहीं आती ?

क्यों न चीखूँ कि याद करते हैं
मेरी आवाज़ गर नहीं आती

दाग़-ए-दिल गर नज़र नहीं आता
बू भी ’ए चारागर ! नहीं आती

चारागर = healer/doctor

हम वहाँ हैं जहाँ से हमको भी
कुछ हमारी ख़बर नहीं आती

मरते हैं आरज़ू में मरने की
मौत आती है पर नहीं आती

काब’आ किस मुँह से जाओगे “ग़ालिब
शर्म तुमको मगर नहीं आती

Written by timir

November 20, 2008 at 7:14 pm

Posted in हिन्दी

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