Pratibimb / प्रतिबिम्ब

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Mirza Ghalib’s Ghazals (part-V) : ये न थी हमारी क़िस्मत ( Ye Na Thi Humaari Kismat )

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ये न थी हमारी क़िस्मत के विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इन्तेज़ार होता

विसाल-ए-यार = meeting with lover

तेरे वादे पर जिये हम तो ये जान झूट जाना
के ख़ुशी से मर न जाते अगर ’ऐतबार होता

’ऐतबार = trust/confidence

तेरी नाज़ुकी से जाना कि बन्धा था ’एहेद-बूदा
कभी तू न तोड़ सकता अगर ऊस्तुवार होता

’एहेद = oath, ऊस्तुवार = firm/determined

कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीर-ए-नीमकश को
ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता

तीर-ए-नीमकश = half drawn arrow, ख़लिश = pain

ये कहाँ कि दोस्ती है के बने हैं दोस्त नासेह
कोई चारसाज़ होता, कोई ग़मगुसार होता

नासेह = councellor, चारसाज़ = healer, ग़मगुसार = sympathizer

कहूँ किससे मैं के क्या है, शब-ए-ग़म बुरी बला है
मुझे क्या बुरा था मरना ? अगर एक बार होता

हुए मर के हम जो रुस्वा, हुए क्यों न ग़र्क़-ए-दरिया
न कभी जनाज़ा उठता, न कहीं मज़ार होता

ग़र्क़ = drown/sink

ये मसाइल-ए-तसव्वुफ़, ये तेरा बयाँ “ग़ालिब” !
तुझे हम वली समझते, जो न बादा-ख़्वार होता

मसाइल = topics, तसव्वुफ़ = mysticism, वली = prince/friend, बादा-ख़्वार = boozer

Written by timir

April 14, 2008 at 10:55 am

Posted in हिन्दी

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