Pratibimb / प्रतिबिम्ब

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“ग़ज़ल” को पहचानिए(सौजन्य:रमण कौल)

with 8 comments

This post is “copied” from the following site: http://www.kaulonline.com/chittha/?cat=2.
लगभग सभी हिन्दी भाषी जो कविता में रुचि रखते हैं, हिन्दी संगीत में रुचि रखते हैं, किसी न किसी रूप में ग़ज़ल में भी रुचि रखते हैं। जो लोग उर्दू-दाँ नहीं भी हैं और महदी हसन, ग़ुलाम अली की गाई कुछ पेचीदा ग़ज़लें नहीं भी समझ पाते, उनके लिए पंकज उधास अवतार सरीखे आए। उन्होंने सरल ग़ज़लों को सरल धुनों में गाया और ग़ज़ल भारत में जन-जन की चहेती हो गई। फिर अपने जगजीत सिंह तो हैं ही ग़ज़लों के बादशाह — कौन होगा जिसके म्यूज़िक कलेक्शन में जगजीत सिंह के सीडी-कसेट नहीं होंगे। अपनी बलागर मंडली में ही कुछ लोग ख़ुद ग़ज़लें लिखते है तो कुछ बड़े बड़े शायरों की ग़ज़लें जन जन तक पहुँचाने में लगे हुए हैं। उर्दू के चलते फिरते शब्दकोश भी बैठे हैं हमारे बीच।
चलिए बात करते हैं कि ग़ज़ल क्या है। ग़ज़ल शे’रों का एक समूह है जिसके शुरू में मतला होता है, आख़िर में मक़ता होता है, मक़ते में अक़्सर शायर का तख़ल्लुस होता है। पूरी ग़ज़ल में एक सा बहर होता है। क़ाफ़िया ज़रूर होता है, रदीफ़ हो या न हो। यानी ग़ज़ल हमरदीफ़ भी हो सकती है और ग़ैरमुदर्रफ़ भी।
एक मिनट! एक मिनट! कुछ ज़्यादा उर्दू हो गई, है न? चलिए इसको ज़रा आसान बनाते हैं एक मिसाल की मदद से। नासिर क़ाज़मी की इस सीधी-सादी ग़ज़ल को लीजिए (पूरी ग़ज़ल यहाँ पर है)।
दिल धड़कने का सबब याद आया
वो तेरी याद थी अब याद आया
आज मुश्किल था सम्भलना ऐ दोस्त
तू मुसीबत में अजब याद आया
हाल-ए-दिल हम भी सुनाते लेकिन
जब वो रुख़सत हुए तब याद आया
बैठ कर साया-ए-गुल में ‘नासिर’
हम बहुत रोये वो जब याद आया
शे’र – ग़ज़ल का हर शे’र अपने आप में दो पंक्तियों की पूरी कविता होती है। यानी हर शे’र को अलग से प्रस्तुत किया जा सकता है। प्रायः ग़ज़ल में एक कहानी या कविता सा लगातार प्रवाह भी नहीं होता। यानी आप अश’आर (शे’रों) को ऊपर नीचे भी कर सकते हैं और उन की संख्या को घटा बढ़ा भी सकते हैं। हर शे’र की पहली पंक्ति को सुनाना, दोहराना, दूसरी लाइन का सस्पेन्स बिल्ड करना, फिर दूसरी लाइन पर वाहवाही लूटना एक अच्छे शायर का हुनर है, और कई चुटकुलों की पृष्ठभूमि भी।
मतला – ग़ज़ल के पहले शे’र को मतला कहते हैं। इसकी दोनों पंक्तियों का समान अन्त होता है (तुकबन्दी)। यही अन्त बाक़ी सभी शे’रों की दूसरी लाइन का होता है। ग़ज़ल के मतले से ही उस के बहर, रदीफ़ और क़ाफिए का पता चलता है।
बहर – हर पंक्ति की लंबाई एक सी होती है और इस लंबाई को बहर कहते हैं। ग़ज़ल ऊपर लिखी ग़ज़ल की तरह मध्यम बहर की हो सकती है, या फिर “अपनी धुन में रहता हूँ / मैं भी तेरे जैसा हूँ” की तरह छोटे बहर की, या “ऐ मेरे हमनशीं, चल कहीं और चल इस चमन में अब अपना गुज़ारा नहीं / बात होती गुलों की तो सह लेते हम अब तो काँटों पे भी हक़ हमारा नहीं” की तरह लम्बे बहर की।
रदीफ़ – हर शे’र के अन्त में आने वाले समान शब्द/शब्दों को रदीफ़ कहते हैं। ऊपर लिखी ग़ज़ल में रदीफ़ है “याद आया”। एक से रदीफ़ वाली ग़ज़लें हमरदीफ़ कहलाती हैं। कुछ ग़ज़लें बिना रदीफ़ की होती हैं, यानी ग़ैर-मुदर्रफ़, जैसे “दैरो हरम में बसने वालो / मैख़ानों में फूट न डालो।”।
क़ाफ़िया – रदीफ़ से पहले आने वाले मिलते जुलते शब्द को क़ाफ़िया कहते हैं। इस ग़ज़ल का क़ाफ़िया है अब, अजब, तब, आदि।
मक़ता – ग़ज़ल के आखिरी शे’र को मक़ता कहते हैं। इसमें अक़्सर शायर का तख़ल्लुस यानी उपनाम बताया जाता है। जैसे ऊपर की ग़ज़ल में “नासिर”, या अपने रवि भाई की ग़ज़लों में “रवि”। आजकल कई ग़ज़लें बिना मक़ते के भी लिखी जाती हैं।
कई बार हम मशहूर ग़ज़ल गायकों की गाई हर नज़्म को ग़ज़ल समझते हैं जब कि वह ग़ज़ल की परिभाषा पर खरी नहीं उतरती। जैसे कि “बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी..” ग़ज़ल नहीं है। “चान्दी जैसा रंग है तेरा, सोने जैसे बाल” भी ग़ज़ल नहीं है। डा॰ इक़बाल की “सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा / हम बुलबुलें हैं इसकी ये गुलसिताँ हमारा” ग़ज़ल है। आशा भोंसले की गाई “इन आँखों की मस्ती के मस्ताने हज़ारों हैं / इन आँखों से वाबस्ता अफ़साने हज़ारों हैं” भी ग़ज़ल है। कई गज़लें कव्वाली के रूप में गाई जाती हैं, जैसे “निगाहें मिलाने को जी चाहता है / दिलो-जाँ लुटाने को जी चाहता है”।

Written by timir

September 9, 2006 at 2:56 pm

Posted in हिन्दी

8 Responses

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  1. मूल लेख के लिए मेरे ब्लॉग की यह प्रविष्टि देखें। तिमिर जी, आप को मेरी प्रविष्टि अच्छी लगी, इस के लिए धन्यवाद। परन्तु अच्छा यह होता यदि आप इसे अक्षरशः नक्ल करने के बदले इस के विषय में लिखते या इस की कड़ी दे देते, या कम से कम मूल लेख का सौजन्य स्वीकारते। हिन्दी चिट्ठाकारी की गरिमा बनी रहे, इस के लिए यह आवश्यक है कि हम कुछ मूल नियमों का पालन करें।

    Raman Kaul

    September 11, 2006 at 6:16 pm

  2. ohh..finally i got some comments….and my hits have sky-rocketed !!!!

    timir

    September 12, 2006 at 9:59 am

  3. अच्छी जानकारी …

    Prabhakar Pandey

    September 12, 2006 at 11:43 am

  4. रमन जी मै आपकी उदारता को प्रणाम करता हू आपने व्‍यक्तिगत सूझबूझ का प्ररिचय देते हुये बात को आगे नही बढाया और सबसे पहले तिमिर जी से सम्‍पर्क किया, व्‍यक्ति कोई भी काम गलत करने की दृष्टि से नही करता है। वैसे कोई किसी की साईट से कोई सामान ले तो‍ किसी चिठ्ठाकार को कोई अपत्ति नही होनी चाहिये। क्‍योकि लेख के दूसरे के वास जाने से उसका (लेख और हिन्‍दी) का प्रचार और प्रसार होता है।
    तिमिर जी आपने भी सही काम किया कि अपत्ति आते ही लिंक दे दिया। किसी दूसरे के ब्‍लाग से कुछ लेना गलत नही पर अपना बना कर नही लेना चाहिये । आप रमन जी का आभार व्‍यक्‍त करे।
    ईश्‍वर से प्रार्थना है कि आप दोनो लोग मिल जुल कर काम करें।

    रमन जी आपका मै तहे दिल से प्रंससा करता हू।

    अन्‍त भला तो सब भला🙂

    प्रमेन्‍द्र प्रताप सिंह

    September 12, 2006 at 4:40 pm

  5. रमन जी, मैं आपका क्षमाप्रार्थी हूँ . मुझे आपका नाम अंकित करना चाहिए था . मैं चिट्ठाकारी में नया नया प्रविष्ट हुआ हूँ . इसलिए इसके नियमों से अनजान था . आगे से इस बात का ध्यान रखूँगा .

    timir

    September 13, 2006 at 7:56 am

  6. तिमिर ( मानवेन्द्र राय चौधरी) के विचारों का सम्मान किया जाना चाहिये।

    Anunad Singh

    September 13, 2006 at 10:16 am

  7. लेख के दूसरे के व्‍लाग पर जाने की घटना को चोरी कहा जाना ठीक न होगा, तथा व्‍लागर को चोर। दे‍खिये यह घटना नई नही है और पिछली भी जो हुयी थ‍ी वह कुछ एक को छोडकर जानबुझ कर नही की गयी।
    मै दो तीन बातो को रखना चाहूगा
    1 यदि सबसे पहले घटना को सामने आने पर मूल लेखक या पाठक टिप्‍प्‍डी के द्वारा चेताये
    2 यदि मूल लेखक ईमेल द्वारा सम्‍पर्क करे और विनय पूर्वक बात करे और सुने
    3 यदि पाठक गण को घटना की जानकारी हो तो वे सिर्फ मूल लेखक को बाताऐ कि उनका लेख दूसरे के ब्‍लाग पर है तथा केवल मूल लेखक ही उनसे ईमेल से सम्‍पर्क करे, पाठक गण केवल टिप्‍पडी करे ईमेल कतई न करे।
    4 मूल लेखक को चाहिये कि सामने वाले को अपनी पूरी बात रखने का मौका दे।
    5 दोषी ठहराऐ जाने वाले व्‍लागर को उसके जवाब देने पूर्व किसी को गूगल समूह या परिचर्चा पर किसी प्रकार की चर्चा या गोष्‍ठी नही करनी चाहिये। तथा किसी प्रकार के आपत्ति जनक शब्‍दो(चोर अ‍ादि) का प्रयोग नही करना चाहिये।
    6 मूल लेखक यह भी देखे की उनका लेख कही विकिपिडिया पर तो नही है। अगर है तो किसी को अपराधी कहने का अधिकार नही है। आप विकिपिडिया से सम्‍पर्क करें।

    प्रमेन्‍द्र प्रताप सिंह

    September 14, 2006 at 4:25 pm

  8. shukriya timirji..main aapka fan ho gaya hun…aap isi tarah blogs chura ke paste karte rahiye…phir alag alag blog kholne ke bajaaye ek aapke hi blog se sabka matter mil jaayega…ati uttam!!!

    anurag malviya

    February 19, 2009 at 6:45 pm


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