Mirza Ghalib’s Ghazals (part-I) : आह को चाहिये (Aah Ko Chahiye)
आह को चाहिये इक ‘उम्र असर होने तक
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक ?
आशिक़ी सब्र तलब और तमन्ना बेताब
दिल का क्या रंग करूँ ख़ून-ए-जिगर होने तक ?
सब्र = patience, तलब = search
दाम हर मौज में है हल्क़ा-ए-सद-काम-ए-नहंग
देखें क्या ग़ुज़रे है क़तरे पे गुहर होने तक
दाम = net/trap, मौज = wave , हल्क़ा = ring/circle , सद = hundred , नहंग = crocodile
सद-काम-ए-नहंग = crocodile with a hundred jaws, गुहर = pearl
हम ने माना के तग़ाफ़ुल न करोगे, लेकिन
ख़ाक हो जायेंगे हम तुमको ख़बर होने तक
तग़ाफ़ुल = neglect/ignore
पर्तव-ए-खुर से है शबनम को फ़न’आ की तालीम
मैं भी हूँ इक इनायत की नज़र होने तक
पर्तव-ए-खुर = sun’s reflection/light/image,शबनम = dew, फ़न’आ = mortality, इनायत = favour
यक़-नज़र बेश नहीं फ़ुर्सत-ए-हस्ती ग़ाफ़िल
गर्मी-ए-बज़्म है इक रक़्स-ए-शरर होने तक
बेश = too much/lots,फ़ुर्सत-ए-हस्ती = duration of life, ग़ाफ़िल = careless, रक़्स = dance
शरर = flash/fire
ग़म-ए-हस्ती का “असद” किस’से हो जुज़ मर्ग इलाज
शम्म’आ हर रंग में जलती है सहर होने तक
हस्ती = life/existence, जुज़ = other than , मर्ग = death,सहर = morning